Ye Khamoshi kya Cheez Hai | Whatsapp Status Shayari00:22

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Published on February 12, 2018

Ye Khamoshi kya Cheez Hai | Whatsapp Status Shayari

तुम्हारी साँसों से साँस लेता

तभी तो पागल बना हुआ हूँ !

कसम तब्बसुम तुम्हारी देखीं

तभी तो इतना फ़िदा हुआ हूँ !!

तुम्हे सजाऊँ बड़े ही मन से

बड़ी वफ़ा से ये ख्वाब देखा !

मगर अधूरा रहा क्यूँ सपना

नयन बुझाकर पड़ा हुआ हूँ !!

मुझे उठाकर धरा से तुम ने

गले लगाकर बड़ा हँसाया !

तराशा मुझको बनाया हीरा

तभी दिलो में जड़ा हुआ हूँ !!

तड़प रहा बन तेरा दिवाना

मुझे तुम्हारी बड़ी जरूरत !

नहीं संभालो कभी मुझे तुम

तभी मनाने अड़ा हुआ हूँ !!

सनम तुम्हारी अदा इबादत

खुदा कहूँ तब गलत नहीं है !

मुझे भुलाकर चली न जाओ

तभी तो दर पे खड़ा हुआ हूँ !!

कई जनम का है प्रेम अपना

न टूट सकता किसी जफ़ा से !

मुझे पता सुन बड़ी तू पावन

तभी तो दिल में बसा हुआ हूँ !!

तुझे कसम से कहा जो गंगा

वफ़ा करे सुन तुम्हारी सागर !

तुम्हारी पावन बड़ी है महिमा

कही न खो दूँ डरा हुआ हूँ !!

 

मुहब्बत बहुत ही कबीराना है

ये मुहब्बत बहुत ही कबीराना है न जाने किस तरह तुम ने जिया होगा

मजाजी, हकीकी कई रंग हैं इश्क के जाने कब किस रंग को चुना होगा

जिंदगी जीने का वक्त कम मुख्तसर, जाने वक्त किस तरह दिया होगा

कई तरीके हैं जीने के जमाने में, जाने कब किस तरीके को चुना होगा

बेरंग पानी भी नहीं तो जज्बात को जाने किस तरह बेरंग किया होगा

अपनों में पराये और परायाओं में अपने, जाने कैसे अपना किया होगा

जाने तुम्हें मोह का कौन-सा मंतर कब बाजार ने इस तरह दिया होगा

खुशबू जो हँसी में है जाने उसे किसने कब किस सामान से लिया होगा

दिल देह में रहता था, अब दिल में देह को जाने किस तरह सिया होगा

झूठ हो बेशक इश्क ने हर आँख को यकीनन कभी-न-कभी रुलाया होगा

 

मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ

ना ना, किसी लव गुरु ने नहीं

यह तो कबीर ने सिखलाया है

सभ्यता को कान में बताया है

प्रेम में नाचता हुआ मत्त मन

आत्मन्वेषण और आत्मविस्तार

के कठिन रास्ते पर कदम बढ़ाता है

तब उसका ‘नाच’ चुपके से

आलोचना में बदल जाता है।

जैसे वसंत

चुपके से चुंबन में सिमट जाता है

प्रेम सिर्फ भावना न रहकर

मौसम बन जाता है और

अपनी धुरी पर नाचती हुई धरती

हल्की-सी सिहरन के साथ

चुपके से प्रेमपत्र में बदल जाती है।

पूछो तुलसी से कि कैसे

किसी राम का मन खग-मृग-मधुकर से

छल मृग के दृश्याभास से बिंधे

अपनी सीता के मन का पता पूछता है

कहेंगे रवींद्र कि कैसे पागल हवा में

मन का पाल खुल जाता है

उधियाता हुआ मन मानसरोवर पहुँच जाता है

बतायेंगे नागार्जुन जिन्होंने बादल को घिरते देखा

जिन्होंने हरी दरी पर प्रणय कलह छिड़ते देखा

कालिदास से पूछा पता व्योम प्रवाही गंगाजल का

ना ना, किसी लव गुरु ने नहीं

यह तो जीवन के ताना-बाना ने

पुरखों ने सिखलाया है

कि इस कठकरेज दुनिया में

मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ

हे मेरे जीवन से एक-एक कर विदा हो रहे

रूप-रस-गंध के यौवन

मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ

 

सबसे महँगा प्रेम धन, इसका अजब सुभाय

बाँटे से बढ़ता सदा,जोड़े से घट जाय

जुड़ा हुआ है प्रेम से, धरती औ, आकाश

नक्षत्रों को जोड़ता, आपस का विश्वास

जड़ चेतन से प्रेम ही,जग का मूलाधार

आपस में जुड़ करबढ़े,वसुधा का परिवार,

नाजुक धागा प्रेम का,नाजुक मन से थाम

भला भला ही सोचना, भला मिले परिणाम

वसुधा एक कुटुम्ब है, प्रेम बाँट लें यार

तब आपस में जीत क्या, क्या आपस में हार

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